NRC AND CAB

National Register of Citizens AND Citizenship Amendment Bil

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नमस्कार दोस्तों आज मैं आपसे एनआरसी के बारे में बात करने आया हूं जो कि सरकार के द्वारा असम के घुसपैठियों के लिए या उनको यह कह सकते हैं कि 1971 में वह व्यक्ति जो बांग्लादेश से विस्थापित होकर भारत में आए थे अपनी जान माल की रक्षा के लिए जो बांग्लादेश के सीमा राज्य असम पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा सीमा के क्षेत्र में बस गए तो इसको लेकर असम में काफी विरोध प्रदर्शन हुआ कि यह लोग उनके संस्कृति और भाषा को नुकसान पहुंचाएंगे। फिर इस विरोध की वजह से काफी हिंसा हुई और इस हिंसा की वजह से वहां पर बहुत लोगों की जान गई जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों थे।  जहां पर मसला यह है कि असम के लोग हिंदू मुस्लिम के बारे में नहीं बल्कि बाहर से आए जो कि बांग्लादेशी थे उनके खिलाफ क्योंकि यह लोग असम के लोगों का हक मार रहे थे। यह मानना था स्थानीय लोगों का। इसी वजह से असम में मैं बहुत हिंसा हुई जिसकी वजह से भारत सरकार और असम के स्थानीय नेताओं के बीच एक समझौता हुआ, जिसे असम करार कहा गया। इसमें सरकार ने असम के लोगों के हितों की रक्षा करने के लिए तथा 1971 के बाद से आए हुए घुसपैठियों को असम से बाहर निकालने की बात पर सहमति हुई।
तब सरकार ने वादा की एनआरसी लाएंगे और बाहर के जितने भी घुसपैठिए हैं उन्हें पहचान कर अलग किया जाएगा, पर सरकार ने यह बात ठंडे बस्ते में डाल दी। उसके बाद 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार आई जिसने एनआरसी को लागू किया जिससे कि जो रिपोर्ट निकली उसमें तकरीबन 19 लाख लोग घुसपैठ की के रूप में पहचाने गए। इसमें से भी ज्यादातर हिंदू ही थे इस वजह से हिंदूवादी नरेंद्र मोदी की सरकार आलोचना में गिर गई और इस वजह से कहीं इस पर यह आरोप ना लगे किया सिर्फ हिंदूवादी सरकार होने का ढोंग करती है । इसी कारण बीजेपी की नरेंद्र मोदी सरकार मैं एनआरसी में बाहर निकाले गए हिंदुओं को वापस लेने के लिए सरकार ने सिटीजन अमेंडमेंट बिल 2019 को संसद में पारित करवाया बाहर से आए हुए जितने भी शरणार्थी हैं केवल मुस्लिमों को छोड़कर सबको जो 2014 के दिसंबर 31 तक आए हुए हैं उनको नागरिकता इस बिल द्वारा मिल जाएगी। बिल को लेकर असम में काफी रोष है क्योंकि यह एनआरसी का उल्लंघन कर रहा है एक तरह से देखा जाए तो असम के नागरिकों द्वारा मागे गए एनआरसी का मजाक बना दिया गया।लेकिन भारत सरकार यह कह रही है कि हम एनआरसी को पूरे देश में लागू करेंगे यानी पूरे देशवासियों को असम की तरह अपने आप को इस देश का नागरिक साबित करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ेगी और यह बताना पड़ेगा कि आप ही वह व्यक्ति हो जो इस देश में जन्म से रह रहा है, और इस देश का नागरिक है।इस वजह से विपक्ष से लेकर देश के विभिन्न इलाकों में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जोरों पर हैं वह सिटिजन अमेंडमेंट बिल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि सरकार नए संविधान का आर्टिकल 14 का उल्लंघन किया है जिसमें सबको बराबर का अधिकार दिया गया है।इसका मूलता विरोध इस बात को लेकर हैं इसमें केवल धर्म के आधार पर अमेंडमेंट किया गया है जो कि हमारे संविधान खिलाफ तो है, और उसकी आत्मा को भी चोट करता है जहां पर संविधान निर्माताओं ने संविधान बनाते समय इस बात का ख्याल रखा था की भारत एक लोकतांत्रिक देश के साथ साथ  एक धर्मनिरपेक्ष पंथनिरपेक्ष देश होगा जहां सबको बराबरी का अधिकार होगा और सब को कानून की नजर से देखा जाएगा।सरकार को बताना होगा की वह एनआरसी लाकर क्या साबित करना चाहती हैं? क्या अब हर एक देशवासी को कागज कागज लेकर घूमना पड़ेगा कि हम इस देश के नागरिक हैं और आप हमें विदेशी ना समझें या फिर हमको अपने नागरिक होने का सबूत दिखाना पड़ेगा कि हां हम देश के नागरिक हैं विदेशी नहीं है? बात यहीं पर खत्म नहीं होती क्योंकि यह नियम लागू होने से केवल एक धर्म के लोगों को प्रभाव नहीं पड़ेगा बल्कि उन सभी पर प्रभाव पड़ेगा जो इस देश में रह रहे हैं अभी हम जो उत्तर भारतीय हैं या दक्षिण भारतीय हैं हमें ऐसा लगता है की हम आसानी से साबित कर सकते हैं कि हम इस देश के नागरिक हैं लेकिन असम में रहने वाले लोगों से पूछिए कि उन्हें यह साबित करने के लिए कि वह इस देश के नागरिक हैं उन्हें कितने मेहनत करनी पड़ी कितना मानसिक तनाव झेलना पड़ा और जो बाहर से आए थे जैसे बिहार पश्चिम बंगाल झारखंड उन्हें भी यह साबित करने में काफी परेशानी हुई और पैसे खर्च करने पड़े कि वह इस देश के नागरिक हैं। तो जरा सोचिए यह समस्या हमें थोक के भाव दी जा रही है और हम भी अपने जरूरी काम छोड़ के केवल यह साबित करने में लग जाएंगे की हम और हमारा परिवार इस देश का नागरिक है इसके लिए हमें काफी मशक्कत करनी पड़ेगी सच मानिए इतना आसान नहीं होगा अगर सरकार इसे लागू करेगी तो इस समस्या का सामना हम सब को करना पड़ेगा और काफी दर्द और तनाव देगा इसे अगर अभी नहीं रोका गया तो बाद में हम केवल पछताएंगे और यह सोचेंगे कि काश कि पहले हम इसे रोक लिए होते पहले सरकार को इसके लिए मना कर दिया होते हैं सोचिए गा।

बेरोजगारी

टाइटल से आप  समझ गए होंगे की आज किस विषय पर बात करने आया हूँ। 

       हमारे देश में लोग कहते है की सरकारी नौकरी से बेहतर और कोई नौकरी नहीं है, क्योकि इसमें आपको 

सैलरी समय पर मिलती है। सबसे बड़ा फायदा ये है की आप की नौकरी सुरक्षित रहती है आप अपने परिवार के साथ अच्छे से जीवन यापन कर सकते है। समाज में आपकी हैसियत होती है लोग आपको सम्मान देते है।  बस इन्ही कारणों से लोग इसे पसंद करते है भले ही आपको 4 ग्रेड की क्यों न ही मिल जाये। 

इसी कारण युवा अपनी जवानी को तनाव और तैयारी में लुटा रहे है वो अपनी जिंदगी को खुलकर नहीं जी रहे है। 

कुछ लोग आलोचन करते है की केवल सरकारी नौकरी ही क्यों प्राइवेट भी करो सभी लोग सरकारी नहीं कर सकते है बात तो सही भी पर आज के महंगाई के दौर में प्राइवेट कंपनी किसी को गवर्मेन्ट की तरह सुविधा नहीं देती अगर देती तो आज सबलोग प्राइवेट को भागते न की सरकरी।  

एक समय ऐसा भी था देश में की प्राइवेट कंपनी में काम कर रहे कर्मचारी को अच्छी सैलरी और सुविधा मिलती थी कर्मचारियों को ये संस्थाए कॉलोनी जैसी बुनियादी सुविधाएं देती थी उस ज़माने में एक युवा की चाहत होती किसी अच्छी कंपनी में जॉब करना। लेकिन ऐसा क्या हुआ की अब लोग सरकारी जॉब के पीछे पड़े है क्यों प्राइवेट सेक्टर युवाओ को एक अच्छा कर्रिएर नहीं दे रहा है आखिर इतनी बेरोजगारी का कारण क्या है? कभी आपने सोचा? क्यों युवा स्नातक होते हुए भी अच्छी जॉब नहीं ले पा रहे है ? 

हमारे देश में बेरोजगारी का आलम ये है की युवा जो B.sc , BBA , LLB , B.tech , MBA इत्यादि जैसे प्रोफेशनल कोर्स किये हुआ है उनको भी आज कोई नहीं पूछ रहा है इसकी बानगी ये है की पिछले दिनों तमिलनाडु विधानसभा सचिवालय में स्वीपर का काम और सैनिटरी कर्मचारियों के पद की दौड़ में एम.टेक, बी.टेक और एमबीए, पोस्ट ग्रेजुएट और ग्रेजुएट के साथ ही कई पेशेवर योग्यता वाले लोग भी शामिल हैं. 

ये तो कुछ भी नहीं है जब रेलवे ने अपनी जॉब निकली तो देश भर से युवाओ ने आवेदन किया जिसकी संख्या 2 करोड़ से ऊपर निकल गई। आलोचक तो ये ही बोलेंगे की ये युवा इस काबिल भी नहीं है वरना इनको भी जॉब मिल जाती देश में काम की कमी नहीं है।

चलो मैंने माना ये काबिल नहीं है पर इनको नाकाबिल किसने बनाया ? किस कारण इनकी डिग्री बेकार है ? इनका शिक्षा किसके वजय से अधूरी है ? इनको वह अवसर क्यों नहीं दिया गया की वो अपने आपको काबिल बनसके? इसका जवाब तो केवल आप अपने आपसे पूछे आखिर ये हुआ क्यों हमने अपनी सरकारों से ये सवाल क्यों नहीं पूछा? सोचिये गा आपकी न सही आपकी आने वाली पीढ़ी  का सवाल है अगर ये ही होता रहा तो उनका भी यही हाल होगा।

हमारे देश में सरकारों ने हमें बेवकूफ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी इस वक़्त भी  वो हमें हमारे जरुरी मुद्दे से भटकाते हुए नज़र आ रहे है। इस समय देश में  चार दशक की सबसे ज्यादा बेरोजारी है जो सरकारी आकड़ो के मुताबिक 6. 1 % की दर पर पहुँच गई है।

Economic times के अनुसार भारत में 24 लाख सरकारी पद इस समय खाली पड़े है विभिन्न विभागों में

अगर सरकार इन पदों को भर दे तो देश में काफी हद तक बेरोजगारी की समस्या से निदान मिल सकता है लेकिन अभी तक की सरकारों ने लोगों को केवल वोट बैंक का माध्यम बना रखा है जिसकी वजह से वह केवल आम लोगों को वादा तो करते हैं कि हम आपके लिए हर सुविधा करेंगे पर वह चुनाव जीतने के बाद लोगों के लिए किए गए वादों को भूल जाते हैं तो हर कोई जानता है, पर क्या नेता अपने इलाकों में अच्छे स्कूल अच्छी सड़कें अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं दे सकते हैं?

अगर सरकार लोगों की सुविधाओं को बढ़ाएगी तो इससे लोगों की जरूरते तो पूरी होंगी और बेरोजगारी भी काफी हद तक कम की जा सकती है।

देश के विभिन्न राज्यों में कई सारे विभागों में पद काफी मात्रा में खाली जिनको अभी तक भरा नहीं जा सका इस कारण सरकारी कामों काफी देर हो रही है।

अकेले उत्तर प्रदेश में ही चार लाख शिक्षकों के पद खाली है जिसके कारण सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का आभाव है, इस कारण देश में बच्चो को बुनियादी शिक्षा के  लिए प्राइवेट स्कूलों और महगी फीस  को मज़बूरी की वजय से लेना पड़ रहा है।

अभी देश की राजधानी में दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडहॉक शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन किया और कर रहे है क्योकि ये भी एक तरह की बेरोजगारी का सामना कर रहे है इन्हे अपने रोज़गार के लिए जो कभी भी निकले जा सकते है के लिए संघर्ष कर रहे है।

कुल मिला के देश में इस वक़्त 45 साल की सबसे ज्यादा बेरोजगारी है, पर सरकार को इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया, और  इसमें नोटेबंदी , GST , सरकारी रवैया भी कारण है।

सब को मिलके ये सोचन होगा की सरकार कैसे अपनी निति में बदलाव लाये ये हालत सामान्य नहीं है।

 युवाओ में रोष व्याप्त है अगर ये रोष गुस्से में बदल गया तो देश में हालत ख़राब हो जायेंगे।

इसलिये सरकार से निवेदन है ही की वो अपने सिस्टम को सुधारे जिसमे एग्जाम लेने वाली संस्था का भरोसेमंद होना, एग्जाम का टाइम से होना, जल्द से जल्द रिजल्ट का जारी करना और ज्वाइन करना ये सब केवल 6 महीने में होना चाहिए। इतना वक़्त किसी भी एग्जाम को होने और रिजल्ट जारी करने के लिए प्रयाप्त है जिससे की तैयारी कर रहे स्टूडेंट के लिए ज्यादा से ज्यादा मौके मिल सके और वो लगन से तैयारी कर सके।

अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक समय सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था थी, पर आज चीन नंबर एक की पोजीशन पर है इसकी जीडीपी दर भारत से मात्र  .1 % ज्यादा है.इस वक़्त भारत की जीडीपी दर 6.0 % के आस पास है।
भारत की अर्थव्यवस्था अपने बुरे दौर से गुजर रही है।  इसका का प्रमाण है सरकार के टैक्स कलेक्शन में कमी आना, आद्योगिक सेटर का नकारात्मक विकास दर, मज़दूरों की छटनी, निर्यात में कमी होना इत्यादि है.

 कोयला, कच्‍चा तेल, उर्वरक, स्‍टील, पेट्रो रिफाइनिंग, बिजली और नेचुरल गैस उद्योगों को किसी अर्थव्‍यवस्‍था की बुनियाद माना जाता है। यही आठ क्षेत्र कोर सेक्‍टर कहे जाते हैं। इनकी विकास दर में कमी या बढोत्‍तरी बताती है कि किसी देश की अर्थव्‍यवस्‍था की बुनियाद की हालत क्‍या है।

इस वक़्त भारत के कोर सेक्टर में 31 ओक्टूबर 2019 में आकड़ो के मुताबिक 5.2 % गिरावट दर्ज़ की गए है। इससे आप हालत का अंदाज़ा लगा सकते है। इस चिंता जनक हालत के कुछ कारण  सरकार की नीतिया है। 

नोटबंदी 

नोटबंदी सरकार द्वारा किया एक ऐसा काम है जो इस हालत का प्रमुख जिम्मेदार है। कालेधन को बैंकिंग सिस्टम और सरकार की तिजोरी में लाने के लिए किया गया प्रयास था जो पूर्णरूप से विफल रहा।  RBI ने एक रिपोर्ट में बयान जारी करके कहा की उसके द्वारा जारी किये गए नोटों में से 99.30%  नोट उसके पास वापस आगए। 

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इसमें किसी भी तरह का कालाधन नहीं पकड़ा गया जिसकी बाते होती थी, थोड़ा या नाम मात्र का धन इधर उधर फेका गया या जलाया गया पर इसमें आम लोगो को बहुत ही तकलीफ हुई क्योकि उनके पास जो नोट थे वे अब बेकार थे, ये कालाधन नहीं उनके मेहनत की कमाई थी जो अब किसी काम की नहीं रही थी।  सरकार ने बिना तैयारी के ये नियम लागू किया। इस देश में लोग जो पढ़े लिखे है वो आज भी बैंकिंग सिस्टम से परिचित नहीं है जिनके पास बैंक अकाउंट है वो भी इसे बहुत ज्यादा नहीं जानते। इस पर सरकार ने बिना अध्ययन किये नोटबंदी की और लोगो को डिजिटल लेनदेन के लिए कहा पर ये भारत जैसे देश में जहाँ कुल आबादी का 74. 04% मतलब 92.55 करोड़ लोग शिक्षित माने जाते है इसका मतलब कत्यई ये नहीं हुआ की सब लोग डिजिटल लेनदेन कर लेंगे।भारत जैसे देश में जहाँ लोग मज़दूरी, बर्तन मझना, रिक्शा चलना, कपडे धोने आदि काम के बदले नगद मांगते है और राशि भी बहुत ज्यादा नहीं होती है वहाँ के लोग क्या डिजिटल लेनदेन को तैयार होंगे जिनको टेक्नोलॉजी की जरा सी भी जानकारी नहीं है ?

गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST)

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भारत में टैक्स जमा करना हमेशा से एक कठिन कार्य रहा है इस वजय से देश में टैक्स जमा करने की दर हमेशा से कम रही है चाहे व्यक्तिगत हो या व्यापारिक लोग हमेशा से इससे बचने की कोशिश करते रहे है। GST से पहले सरकारों ने कई तरह के टैक्स लगा रखे थे जब तक लोग इस टैक्स से तालमेल कर पाते तब तक सरकार नया टैक्स सिस्टम ला दिया इसमें हुआ ये की लोग इससे तुरंत अपना नही सके और GST नंबर के बिना आप न तो व्यापार  कर सकते और न ही अपना माल माँगा या भेज सकते है।  इससे चल रहे व्यापार को झटका लगा, लोगो की नौकरियाँ गई, मांग काम हुई, उत्पादन कम होने लगा और अर्थव्यवस्था मंद होती चली गई।

रुपये में गिरावट

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जब भारत में 16 मई 2014 को नयी सरकार का गठन हुआ तो उस समय रूपये की कीमत डॉलर के मुकाबले 59 रूपये के आस पास थी।  वर्तमान में ये कीमत 71 रूपये है जिससे आयत के लागत में की बढ़ोत्तरी हुई है।जिससे भारत का व्यापार घटा बढ़ाकर  103.63 बिलियन डॉलर यानि 74,39,86,71,38,000.00 भारतीय रुपया के बराबर पहुंच गया। सरकार का लगातार आयत बिल बढ़ाता जा रहा है जिससे की सरकार बुनियादी चीजों पर कटौती कर रही है। इसे देश के विकाश में बाधा उत्पन्न हो रही है और इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। 

किसानो की अनदेखी 

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सरकार की नीतिया केवल उद्योग जगत को आगे बढ़ने वाली है इसमें किसानो के हितो को अनदेखा किया जा रहा है जिसक कारण किसान आत्महत्या जैसे काम को मजबूर हो जाते है क्योंकी उन्होने बैंको से जो क़र्ज़ लेके फसल लगाई है, अगर उनको फसल के दाम सही नहीं मिलेंगे तो वो कर्ज कैसे लौटाएंगे ?यहाँ पर बात ये है की भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का विशेष महत्व है क्योकि इस काम में परोछ या अपरोछ 16.5 करोड़ लोग जुड़े है।  इतनी बड़ी संख्या में लोगो के पास अगर पैसे नहीं होंगे तो आप कैसे अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा पाएगे।  इन बिन्दुओ पर अगर सरकार ध्यान देती तो आज बात कुछ और होती, पर जो भी है सरकार को ये मालूम है की देश की हालत सही नहीं है वो भले इसे स्वीकार न करे लेकिन बजट के बाद वित्तमंत्री का प्रेस कॉन्फ्रेंस करके टैक्स में छूट देना और कई सारे टैक्स को रोल बैक करना ये ही बताता है की सरकार परेशान है मंदी को लेकर,

क्योकि वर्ल्ड की सारी रेटिंग एजेंसी की रिपोर्ट यही बताती है की भारत में अभी मंदी जैसे की UN  ट्रेड एजेंसी के मुताबिक भारत की ग्रोथ 7. 2% से 6.0% पर आ गई है पिछले साल के मुकाबले। 

इससे साफ पता चलता है की भारत की इकॉनमी अभी हाल फिलहाल सुधरने वाली नहीं है।  अब केवल वक़्त का इंतज़ार करना पड़ेगा की सरकार की नए पॉलिसी का असर देखने में। 

शिक्षा

शिक्षा क्या होती है जिसके पास न हो आप उससे पूछ के देख सकते है क्या महसूस करता होगा वो व्यक्ति आज समाज में जहा शिक्षा का विशेष महत्व है। 

शिक्षा से समाज में सुधार होता है लोगो की तर्क करने की  शक्ति  का विकाश होता है। 

जीवन में सफलता प्राप्त करने और कुछ अलग करने के लिए शिक्षा सभी के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण साधन है। यह हमें जीवन के कठिन समय में चुनौतियों से सामना करने में सहायता करता है। पूरी शिक्षण प्रक्रिया के दौरान प्राप्त किया गया ज्ञान हम सभी और प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के प्रति आत्मनिर्भर बनाता है। यह जीवन में बेहतर संभावनाओं को प्राप्त करने के अवसरों के लिए विभिन्न दरवाजे खोलती है जिससे कैरियर के विकास को बढ़ावा मिले। ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा के महत्व को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा बहुत से जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। यह समाज में सभी व्यक्तियों में समानता की भावना लाती है और देश के विकास और वृद्धि को भी बढ़ावा देती है। 

पर आज कल शिक्षा  को निजीकरण किया जा रहा है, जिसके कारण गरीब और पिछड़े लोगो का विकाश नहीं हो पा रहा है। 

क्या आप जानते है 2019  – 2020  का शिक्षा पर कितना बजट दिया गया है? नहीं जानते तो आप अब जानिए क्यों की ये आपके बच्चो के भविष्य का सवाल है।  

टोटल जीडीपी का 3% ही यानि  94,853. 64 करोड़ रूपए दिया है, जिसमे से 56536.63 करोड़ रु   स्कूल स्तर और 38317 करोड़ रु  उच्च शिक्षा के लिए दिया गया है। 

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इतने बड़े देश में बजट का केवल 3% ही दिया गया है जो शिक्षको की सैलरी आदि में ही खर्च हो जाएगी बाकि स्कूलों का निर्माण और बुनियादी सुविधाओं का क्या  होगा इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। 

मिड डे मिल के नाम पे सरकार ने भारी भरकम रकम 11000 करोड़ रु दिया है इस साल। 

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 400 करोड़ रु की बढ़ौतरी कर पिछले साल के मुकाबले इस साल केंद्रीय विश्विद्यालाओ IIT जैसे संस्थानो को दिए है  जो की न काफी है, इससे साफ़ पता चलता है की सरकार कितनी गंभीर है उच्च शिक्षा को लेकर।

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शिक्षा  पर सभी का हक़ है जो भी सरकार ने धन मुहैया कराया है वो न काफी है इस देश में क्योकि आज भी लोग शिक्षा से वंचित  है इसका कारण  केवल सरकार की नीतिया है, सरकार ने प्राइवेट इंस्टीटूशन को काफी बढ़ावा दिया जिससे की शिक्षा महंगी हो गए और आम लोग इस महंगी शिक्षा को ग्रहण नहीं कर सकते।

 इसका एक उदाहरण ये है की सरक़ार ने IIM का बजट कम करके 455 करोड़ रु  किया है जो पिछले साल 1036 करोड़ रु था। 

JNU एक केंद्रीय विश्व विद्याला है जो पुरे देश में सबसे महंगी हॉस्टल और मेस फीस है जोकि बाकि देश के केंद्रीय विश्व विद्याला से कम है। 

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टॉप 5  केंद्रीय विश्व विद्याला के नाम और उनके हॉस्टल और मेस  फीस जो की सालाना है

1.JNU 55,000-61,000 रु 

2. दिल्ली यूनिवर्सिटी 40000 -55000 रु 

3. जामिया मिल्लिया इस्लामिया 35000 रु 

4. विश्वभारती विश्वविद्यालय 21600 – 30400 रु 

5. पांडिचेरी विश्वविद्यालय 12000रु  

अब आप जान गए होंगे की ये यूनिवर्सिटी कितनी जरुरी है गरीब लोगो के लिए और इनका होना यानि इस देश में  शिक्षा का होना है। 

अगर इनकी फीस को बढ़ा गया तो कितने लोग उच्च शिक्षा से दूर हो जायँगे, इसलिए लोगो को सरकार पे जोर डालना 

चाहिए की इनकी फीस या तो कम हो या मुफ्त हो क्योकि कोई देश तभी तरक्की करेगा जब उस देश के बच्चे शिक्षित होंगे।

JNU FEES HIKE PROTEST

Jawaharlal Nehru University

 जेएनयू को राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NACC) ने जुलाई 2012 में किये गए सर्वे में भारत का सबसे अच्छा विश्वविद्यालय माना है.जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय की स्थापना सन् 1969 में हुई थी। जेएनयू अधिनियम 1966 (1966 का 53) को भारतीय संसद द्वारा 22 दिसम्बर 1966 में पास किया गया था।इस नाम से आप सब वाकिफ होंगे वैसे भी देश की मीडिया ने इसे बदनाम करने में कोई कसार नहीं छोड़ी है, खासकर गोदी मीडिया ने तो इस यूनिवर्सिटी को देश द्रोही गतिविधि का अड्डा तक तक घोषित कर दिया है.ये लोग तो चाहते है की कोई भी आवाज़ सरकार के खिलाफ न उठे सबको बस सरकार  की हर बात सुनाई दे. कितने लोग जानते है की इस प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूशन में दूर दराज के इलाकों से गरीब छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण करने आते हैं और सरकार उनसे यह अधिकार छीनना चाहती है, जो एक मात्र यूनिवर्सिटी है जहाँ वर्ल्ड क्लास फैसिलिटी मिलती है स्टूडेंट को और पढ़ाई के अच्छे मौहौल मिलता है जो इनको आगे बढ़ने में सहायता करता है. सरकार फीस बढ़कर केवल अमीर लोगो के बच्चे को आगे बढ़ने का काम करना चाहती है ताकि जो शिक्षा का स्तर है वो केवल  कुछ कुलिन वर्ग के लोगो के पास रहे. यह एक तरह की साजिश है जो लोगो को समझना होगा, ये केवल J N U  में नहीं हो रहा है। 

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और भी देश के कॉलेज और यूनिवर्सिटी है जहाँ पर ये ट्रेंड है जो ४ व् ५ साल में काफी तेज़ी से बढ़ा है और लोग इसे विकाश का नाम दे रहे है. इसमे उत्तराखंड के आयर्वेदिक कॉलेज है जो हाई कोर्ट का भी आदेश नहीं मान रहे है, 

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इनको इतनी ताकत कहाँ  से मिल रही है?  आप सभी जानते होंगे इन में से कुछ कॉलेज तो मंत्रियो और बाबाओ के है. फीस बढ़ोत्तरी  होनी चाहिए पर क्या 500% या 300% करना कितना जायज है और इसके विरोध में पुलिस इन स्टूडेंट पे लाठी चार्ज करती है. मैं उन पुलिस वालो से पूछना  चाहता हूँ की जब आप  दिल्ली में वकीलों से झड़प हो रही थी तब आप ने क्यों नहीं लाठी चार्ज  किया, तब क्यों आप लोग भाग रहे थे और बाद में आंदोलन करने लगे क्योकि आप वकीलों का कुछ बिगाड़  नहीं सकते उल्टा आप पे केस हो गया. इसलिए उनका गुस्सा आपने स्टूडेंट पे उतार दिया।देशभर में छात्र आंदोलन करे फीस बढ़ोत्तरी के खिलाफ या अपनी पढ़ाई पे ध्यान दे.  अब तो लगता ही शिक्षा को भी सरकार बेचना चाहती है जैसे सरकारी कंपनी आदि को बेच रही है. जिसके हाथ में जितना धन वो उतना शिक्षित होगा, यानि यहाँ भी मोनोपोली चलेगी केवल।अगर अभी इसका विराध नहीं हुआ तो बिकाऊ मीडिया इसे भी देशभक्ति के नाम पे सही ठहराएगा।हमें JNU  के छात्रों का साथ देना होगा उनके साथ खड़ा होना होगा। 

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